श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  3.1.217 
“वृन्दावने याह’ तुमि, रहिह वृन्दावने ।
एकबार इहाँ पाठाइह सनातने” ॥217॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा, "अब तुम वृंदावन जाओ और वहीं रहो। तुम अपने बड़े भाई सनातन को यहाँ भेज सकते हो।"
 
Mahaprabhu said, "Now you go to Vrindavan and stay there. You can send your elder brother Sanatana here."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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