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श्लोक 3.1.195  |
किं काव्येन कवेस्तस्य किं काण्डेन धनुष्मतः ।
परस्य हृदये लग्नं न घूर्णयति यच्छिरः ॥195॥ |
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| अनुवाद |
| "'धनुर्धर के तीर या कवि की कविता का क्या उपयोग है यदि वे हृदय को भेदते हैं, परन्तु सिर को घुमाते नहीं हैं?' |
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| “What good are the arrows of an archer or the poems of a poet if they penetrate the heart but fail to make the head spin?” |
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