श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 195
 
 
श्लोक  3.1.195 
किं काव्येन कवेस्तस्य किं काण्डेन धनुष्मतः ।
परस्य हृदये लग्नं न घूर्णयति यच्छिरः ॥195॥
 
 
अनुवाद
"'धनुर्धर के तीर या कवि की कविता का क्या उपयोग है यदि वे हृदय को भेदते हैं, परन्तु सिर को घुमाते नहीं हैं?'
 
“What good are the arrows of an archer or the poems of a poet if they penetrate the heart but fail to make the head spin?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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