श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 193
 
 
श्लोक  3.1.193 
“कवित्व ना हय एड़ अमृतेर धार ।
नाटक - लक्षणा सब सिद्धान्तेर सार” ॥193॥
 
 
अनुवाद
श्रील रामानंद राय ने कहा, "यह कोई काव्यात्मक प्रस्तुति नहीं है; यह अमृत की सतत वर्षा है। वास्तव में, यह सभी परम अनुभूतियों का सार है, जो नाटकों के रूप में प्रकट होता है।"
 
Srila Ramanand Raya said, "This is not a poetic presentation, it is a continuous shower of nectar. Indeed, this is the essence of all principles, manifested in the form of dramas."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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