श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 192
 
 
श्लोक  3.1.192 
एत शुनि’ राय कहे प्रभुर चरणे ।
रूपेर कवित्व प्रशंसि’ सहस्त्र - वदने ॥192॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर श्रील रामानन्द राय ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में श्रील रूप गोस्वामी की काव्यात्मक अभिव्यक्ति की उत्कृष्टता को समर्पित कर दिया और उसकी प्रशंसा इस प्रकार करने लगे मानो उनके हजारों मुख हों।
 
Hearing this, Srila Ramanand Rai presented at the feet of Sri Chaitanya Mahaprabhu the greatness of Srila Rupa Goswami's poetry and started praising him as if he had a thousand mouths.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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