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श्लोक 3.1.191  |
विहार - सुर - दीर्घिका मम मनः - करीन्द्रस्य या विलोचन - चकोरयोः शरदमन्द - चन्द्र - प्रभा ।
उरोऽम्बर - तटस्य चाभरण - चारु - तारावली मयोन्नत - मनोरथैरियमलम्भि सा राधिका ॥191॥ |
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| अनुवाद |
| "श्रीमती राधारानी वह गंगा हैं जिनमें मेरे मन का हाथी लीला करता है। वे मेरे नेत्रों रूपी चकोर पक्षियों के लिए शरद ऋतु के पूर्ण चन्द्रमा की चमक हैं। वे मेरे वक्षस्थल रूपी आकाश की सीमा पर तारों की चमकीली और सुन्दर शोभा हैं। आज मैंने अपने मन की उच्च अवस्था के कारण श्रीमती राधारानी को प्राप्त किया है।" |
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| "Srimati Radharani is the Ganges, in which the elephant of my mind roams. She is the full moon of autumn for the sparrows of my eyes. She is the glittering ornament of the stars, the bright and beautiful decoration on the edge of the sky of my chest. Today, I have attained Srimati Radharani because of the elevated state of my mind." |
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