श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  3.1.190 
सह - चरि निरा तङ्कः कोऽयं युवा मुदिर - द्युतिर् व्रज - भुवि कुतः प्राप्तो माद्यन्मतॆ - गज - विभ्रमः ।
अहह च टुलैरुत्सर्पद्रिईगञ्चल - तस्करैर् मम धृति - धनं चेतः - कोषाद्विलुण्ठयतीह यः ॥190॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र, यह निर्भीक युवक कौन है? यह बिजली के बादल के समान तेजस्वी है और मदमस्त हाथी की भाँति अपनी लीलाओं में विचरण करता है। यह वृन्दावन में कहाँ से आया है? हाय, अपनी चंचल चाल और मोहक दृष्टि से यह मेरे हृदय के भंडार से मेरे धैर्य का खजाना लूट रहा है।"
 
"O dear friend, who is this fearless young man? He is as radiant as a lightning cloud and roams like a mad elephant in his pastimes. Where did he come from in Vrindavan? Alas, with his playful gestures and captivating glances, he is plundering the treasure of patience from the vault of my heart."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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