श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 180
 
 
श्लोक  3.1.180 
राय कहे , - “रूपेर काव्य अमृतेर पूर ।
तार मध्ये एक बिन्दु दियाछे कपूर” ॥180॥
 
 
अनुवाद
श्रील रामानंद राय ने आपत्ति जताई, "यह क्षार नहीं है। यह कपूर का एक कण है जिसे उन्होंने अपनी उत्कृष्ट काव्यात्मक अभिव्यक्ति के अमृत में डाला है।"
 
Srila Ramanand Raya objected, "This is not acid. This is the camphor particle that he has placed in the nectar of his high poetic expression."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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