श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 179
 
 
श्लोक  3.1.179 
“काँहा तोमार कृष्ण - रस - काव्य - सुधा - सिन्धु ।
तार मध्ये मिथ्या केने स्तुति - क्षार - बिन्दु” ॥179॥
 
 
अनुवाद
"भगवान कृष्ण की लीलाओं का तुम्हारा उत्कृष्ट काव्यात्मक वर्णन अमृत सागर के समान है। किन्तु तुमने मेरे विषय में झूठी प्रार्थना क्यों की है? यह तो घृणित क्षार की एक बूँद के समान है।"
 
“Your high-quality poetic descriptions of Krishna's pastimes are like an ocean of nectar.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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