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श्लोक 3.1.169  |
बलादक्ष्णोर्ल क्ष्मीः कवलयति नव्यं कुवलयं मुखोल्लासः पुल्लिं कमल - वनमुल्लङ्घयति च ।
दशा कष्टा मष्टापदमपि नयत्याङ्गिक - रुचिर् विचित्रं राधायाः किमपि किल रूपं विलसति ॥169॥ |
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| अनुवाद |
| "श्रीमती राधारानी के नेत्रों का सौन्दर्य नवविकसित नीलकमल पुष्पों के सौन्दर्य को भी लीन कर देता है, और उनके मुख का सौन्दर्य पूर्णतः खिले हुए कमलों के सम्पूर्ण वन से भी बढ़कर है। उनकी शारीरिक कांति सोने को भी कष्टदायक स्थिति में डाल देती है। इस प्रकार वृन्दावन में श्रीमती राधारानी का अद्भुत, अभूतपूर्व सौन्दर्य जागृत हो रहा है।" |
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| "The beauty of Srimati Radharani's eyes overwhelms the beauty of newly bloomed blue lotuses, and the beauty of her face surpasses even entire forests of fully bloomed lotuses. The radiance of her body seems to distress even gold. Thus, the wondrous, incomparable beauty of Srimati Radharani is rising in Vrindavan." |
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