श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 168
 
 
श्लोक  3.1.168 
महेन्द्र - मणि - मण्डली - मद - विड़म्बि - देह - द्युतिर् व्रजेन्द्र - कुल - चन्द्रमाः स्फुरति कोऽपि नव्यो युवा ।
सखि स्थिर - कुलाङ्गना - निकर - नीवि - बन्धार्गल च्छिदा - करण - कौतुकी जयति यस्य वंशी - ध्वनिः ॥168॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र, ये नवयुवक भगवान श्रीकृष्ण, जो नन्द महाराज के कुल के चन्द्रमा हैं, इतने सुन्दर हैं कि बहुमूल्य रत्नों के समूह की शोभा भी उनकी शोभा को चुनौती देती है। उनकी बाँसुरी की ध्वनि की जय हो, क्योंकि यह चतुराई से सती स्त्रियों के करधनी और तंग वस्त्रों को खोलकर उनके धैर्य को तोड़ रही है।"
 
"O dear friend, this young man, Sri Krishna, the moon of Nanda Maharaja's family, is so beautiful that he surpasses even a cluster of precious gems. All praise to the sound of his flute, for it cleverly breaks the patience of chaste women and loosens their sashes and tight garments."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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