श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 163
 
 
श्लोक  3.1.163 
सखि मुरलि विशाल - च्छिद्र - जालेन पूर्णा लघुरति - कठिना त्वं ग्रन्थिला नीरसासि ।
तदपि भजसि शश्वच्चुम्बनानन्द - सान्द्रं हरि - कर - परिरम्भं केन पुण्योदयेन ॥163॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र बाँसुरी, तुम वास्तव में अनेक छिद्रों और दोषों से भरी हो। तुम हल्की, कठोर, रसहीन और गांठों से भरी हो। परन्तु किस पुण्य कर्म ने तुम्हें प्रभु के चुम्बन और उनके हाथों के आलिंगन की सेवा में लगा दिया है?"
 
"O my dear friend, Vanshi, you are full of many holes or defects. You are light, hard, tasteless, and full of knots. But what kind of virtuous deeds have caused you to be kissed by the Lord and embraced by His hands?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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