श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 162
 
 
श्लोक  3.1.162 
सद्वंशतस्तव जनिः पुरुषोत्तमस्य पाणी स्थितिर्मुरलिके सरलासि जात्या ।
कस्मा त्त्वया सखि गुरोर्विषमा गृहीता गोपाङ्गना - गण - विमोहन - मन्त्र - दीक्षा ॥162॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र बाँसुरी, ऐसा प्रतीत होता है कि तुम बहुत अच्छे कुल में उत्पन्न हुए हो, क्योंकि तुम्हारा निवास श्रीकृष्ण के हाथों में है। तुम जन्म से ही सरल हो और बिल्कुल भी कुटिल नहीं हो। फिर तुमने इस भयानक मंत्र की दीक्षा क्यों ली है जो एकत्रित गोपियों को मोहित कर लेता है?"
 
"O my dear friend Murali, you appear to have been born into a very noble family, for your abode is in the hands of Lord Krishna. You are simple by birth and not the least bit devious. Then why did you take initiation into this dangerous mantra that captivates the assembled gopis?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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