श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 161
 
 
श्लोक  3.1.161 
परामृष्टाङ्गुष्ठ - त्रयमसित - रत्नैरुभयतो वहन्ती स ङ्कीर्णो मणिभिररुणौस्तत्परिसरौ ।
तयोर्म ध्ये हीरोजवल - विमल - जाम्बूनद - मयी करे कल्याणीयं विहरति हरे: केलि - मुरली ॥161॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण की लीलाओं की बांसुरी तीन अंगुल लंबी है और इंद्रनील रत्नों से सुसज्जित है। बांसुरी के सिरों पर अरुण रत्न [माणिक] जड़े हैं, जो अत्यंत सुंदर ढंग से चमक रहे हैं, और इसके सिरों के बीच हीरे जड़े सोने से मढ़ा हुआ है। कृष्ण को प्रसन्न करने वाली यह मंगलमय बांसुरी उनके हाथ में दिव्य तेज से चमक रही है।"
 
"Krishna's playful flute is three fingers long and studded with indigo gems. The ends of the flute are adorned with emeralds, which gleam beautifully. Between the ends, the flute is plated with gold leaf and sparkles with diamonds. This auspicious flute is pleasing to Krishna and shines with a divine radiance in his hand."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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