श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 160
 
 
श्लोक  3.1.160 
क्वचिद्धङ्गी - गीतं क्वचिदनिल - भङ्गी - शिशिरता क्वचिद्वल्ली - लास्यं क्वचिदमल - मल्ली - परिमल: ।
क्वचि द्धारा - शाली करक - फल - पाली - रस - भरो हृषीकाणां वृन्दं प्रमदयति वृन्दावनमिदम् ॥160॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र, वृन्दावन का यह वन अनेक प्रकार से हमारी इन्द्रियों को परम सुख प्रदान कर रहा है। कहीं भौंरे समूह बनाकर गा रहे हैं, तो कहीं मंद-मंद पवन समस्त वातावरण को शीतल कर रहा है। कहीं लताएँ और वृक्षों की टहनियाँ नाच रही हैं, मल्लिका पुष्प अपनी सुगन्ध फैला रहे हैं, और अनार के फलों से रस की प्रचुर वर्षा निरंतर हो रही है।"
 
"O dear friend, this forest of Vrindavan provides our senses with great pleasure in a variety of ways. Somewhere, flocks of bumblebees sing, and somewhere else, a gentle breeze cools the atmosphere. Elsewhere, creepers and tree branches dance, jasmine flowers spread their fragrance, and pomegranate fruits continually flow with abundant juice."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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