श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  3.1.156 
राय कहे , - “वृन्दावन, मुरली - नि:स्वन ।
कृष्ण, राधिकार कैछे करियाछ वर्णन ?” ॥156॥
 
 
अनुवाद
श्रील रामानन्द राय ने आगे पूछा, "आपने वृन्दावन, दिव्य बांसुरी के स्पंदन तथा कृष्ण और राधिका के बीच के संबंध का वर्णन किस प्रकार किया है?"
 
Srila Ramanand Rai further asked, “How have you described Vrindavan, the sound of the divine flute and the relationship between Krishna and Radha?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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