श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 151
 
 
श्लोक  3.1.151 
श्रुत्वा निष्ठुरतां ममेन्दु - वदना प्रेमाङ्कुरं भिन्दती स्वान्ते शान्ति - धुरां विधाय विधुरे प्रायः पराञ्चिष्यति ।
किं वा पामर - काम - कार्मुक - परित्रस्ता विमोक्ष्यत्यसून् हा मौग्ध्यात्फलिनी मनोरथ - लता मृद्वी मयोन्मूलिता ॥151॥
 
 
अनुवाद
"मेरी क्रूरता सुनकर, चंद्रमुखी राधारानी अपने व्यथित हृदय में कुछ सहनशीलता उत्पन्न कर सकती हैं। किन्तु फिर वे मेरे विरुद्ध हो सकती हैं। अथवा, दुर्जेय कामदेव के धनुष द्वारा प्रज्वलित काम-वासनाओं से भयभीत होकर, वे अपने प्राण भी त्याग सकती हैं। हाय! मैंने मूर्खतापूर्वक उनकी कामना की कोमल लता को, जब वह फल देने ही वाली थी, उखाड़ फेंका है।"
 
"Hearing of my cruelty, moon-faced Radharani may muster some patience in her sorrowful heart. But then she may turn against me or, frightened by the lustful desires aroused by the fierce bow of Cupid, she may even give up her life. Alas! I have foolishly uprooted the tender vine of her desire, which was about to bear fruit."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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