श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 146
 
 
श्लोक  3.1.146 
अकारुण्यः कृष्णो यदि मयि तवागः कथमिदं मुधा मा रोदी र्मे कुरु परमिमामुत्तर - कृतिम् ।
तमालस्य स्कन्थे विनिहित - भुज - वल्लरिरियं यथा वृन्दारण्ये चिरमविचला तिष्ठति तनुः ॥146॥
 
 
अनुवाद
“[श्रीमती राधारानी ने अपनी सखी विशाखा से कहा:] ‘हे मेरे प्रिय मित्र, यदि कृष्ण मेरे प्रति निर्दयी हैं, तो तुम्हें रोने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं होगा। तब मुझे मरना ही होगा, परन्तु उसके बाद कृपया मेरे लिए एक काम करना: मेरा अंतिम संस्कार करना, मेरे शरीर को उसकी भुजाओं से लताओं की तरह तमाल वृक्ष का आलिंगन करके रखना ताकि मैं वृन्दावन में सदा के लिए निर्विघ्न रह सकूँ। यही मेरी अंतिम प्रार्थना है।’”
 
"(Shrimati Radharani said to her constant companion Visakha: ) "O dear friend, if Krishna is cruel to me, you need not cry, for it will be through no fault of yours. I will then have to die, but afterward, please do one thing for me - at my funeral, place my body on the Tamala tree in the same way that my arms embrace the Tamala tree like creepers, so that I may remain in Vrindavan forever, unwavering. This is my last request."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd