श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 145
 
 
श्लोक  3.1.145 
अग्रे वीक्ष्य शिखण्ड - खण्डमचिरादुत्कम्पमालम्बते गुञ्जानां च विलोकनान्मुहुरसौ सास्त्रं परिक्रोशति ।
नो जाने जनयन्नपूर्व - नटन - क्रीड़ा - चमत्कारितां बालायाः किल चित्त - भूमिमविशत्कोऽयं नवीन - ग्रहः ॥145॥
 
 
अनुवाद
"अपने सामने मोरपंख देखकर यह बालिका सहसा काँपने लगती है। कभी-कभी गुंजा (छोटे शंखों) की माला देखकर वह आँसू बहाती है और ज़ोर-ज़ोर से रोती है। पता नहीं इस बेचारी बालिका के हृदय में किस नए आनंद का संचार हुआ है। इसने उसे मंच पर अद्भुत, अभूतपूर्व नृत्य रचने वाली वादक जैसी नृत्य-वृत्ति से भर दिया है।"
 
"This girl suddenly begins to tremble at the sight of a peacock feather before her. Whenever she sees a garland of beads, she sheds tears and cries loudly. I don't know what new emotion has entered this poor girl's heart. It has imbued her with a dancing instinct, which constantly produces such amazing, unique dances on the stage."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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