श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  3.1.143 
इयं सखि सु - दु:साध्या राधा - हृदय - वेदना ।
कृता यत्र चिकित्सापि कुत्सायां पर्यवस्यति ॥143॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र, श्रीमती राधारानी के हृदय की यह धड़कन अत्यंत कठिन है। यदि कोई चिकित्सा भी कर ले, तो उसका परिणाम केवल अपयश ही होगा।"
 
"O dear friend, it is extremely difficult to cure these pains in Srimati Radharani's heart. Even if some remedy is attempted, it will only result in disgrace."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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