श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 1: महाप्रभु से श्रील रूप गोस्वामी की द्वितीय भेट  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  3.1.107 
‘ईश्वर - स्वभावा’ - भक्तेर ना लय अपराध ।
अल्प - सेवा बहुमाने आत्म - पर्यन्त प्रसाद ॥107॥
 
 
अनुवाद
भगवान् की विशेषता यह है कि वे किसी शुद्ध भक्त द्वारा किए गए अपराध को गंभीरता से नहीं लेते। भक्त द्वारा की गई किसी भी छोटी-सी सेवा को भगवान इतनी बड़ी सेवा के रूप में स्वीकार करते हैं कि वे अन्य वरदानों की तो बात ही क्या, स्वयं को भी देने को तैयार रहते हैं।
 
Naturally, the Supreme Personality of Godhead does not take seriously any offense committed by His pure devotee. Whatever small service a devotee renders, the Lord accepts it as such a great service that He is willing to offer Himself, not to mention other boons.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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