श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  2.9.97 
महाप्रभु पुछिल ताँरे, शुन, महाशय ।
कोनर्थ जा नि’ तोमार एत सुख हय ॥97॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने ब्राह्मण से पूछा, "हे प्रभु, आप इतने आनंदित प्रेम में क्यों हैं? भगवद्गीता का कौन सा अंश आपको इतना दिव्य आनंद देता है?"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu asked the brahmin, "O sir, why are you in such a state of emotion? What passage of the Bhagavad-gita gives you such transcendental joy?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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