श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 363
 
 
श्लोक  2.9.363 
चैतन्य - चन्द्रेर लीला - अगाध, गम्भीर ।
प्रवेश करते नारि , - स्पर्शि र हि’ तीर ॥363॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अथाह सागर के समान हैं। मेरे लिए उसमें प्रवेश करना संभव नहीं है। किनारे पर खड़े होकर मैं तो बस जल को स्पर्श कर रहा हूँ।
 
The pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu are like a vast ocean. It is impossible for me to penetrate them. I am merely standing on the shore and touching the water.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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