Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 311
 
 
श्लोक  2.9.311 
धनुस्तीर्थ देखि’ करिला निर्विन्ध्याते स्नाने ।
ऋष्यमूक - गिरि आइला दण्डकारण्ये ॥311॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद भगवान धनुष-तीर्थ पहुँचे, जहाँ उन्होंने निर्विन्ध्या नदी में स्नान किया। तत्पश्चात वे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे और फिर दण्डकारण्य पहुँचे।
 
After this, Mahaprabhu reached Dhanustirtha, where he bathed in the Nirvindhya River. He then reached Rishyamuka Mountain and from there proceeded to Dandakaranya.
तात्पर्य
कुछ मतों के अनुसार, ऋषमूक पहाड़ियों की एक श्रृंखला है जो बेलाड़ी जिले के हंपी-ग्राम से शुरू होती है। पहाड़ियों की यह श्रृंखला तुंगभद्रा नदी के तट से शुरू होती है, जो धीरे-धीरे हैदराबाद राज्य तक पहुँचती है। दूसरे मतों के अनुसार, यह पहाड़ी मध्य प्रदेश में स्थित है और इसका वर्तमान नाम रामपा है। दंडकारण्य भूमि का एक विशाल भूभाग है जो खानदेश के उत्तर से शुरू होता है और नासिक और औरंगाबाद से होते हुए दक्षिणी अहमदनगर तक फैला हुआ है। गोदावरी नदी इस भूमि भूभाग के बीच से बहती है, और वहाँ एक महान वन है जहाँ भगवान रामचंद्र रहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)