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श्लोक 2.9.307  |
‘कर्णामृत’ - सम वस्तु नाहि त्रिभुवने ।
याहा हैते हय कृष्णे शुद्ध - प्रेम - ज्ञाने ॥307॥ |
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| अनुवाद |
| तीनों लोकों में कृष्ण-कर्णामृत की कोई तुलना नहीं है। इस ग्रंथ का अध्ययन करने से मनुष्य कृष्ण की शुद्ध भक्ति का ज्ञान प्राप्त करता है। |
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| There is no text in the three worlds comparable to the Krishnakarnamrit. Reading this book gives one the knowledge of pure devotion to Krishna. |
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