Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 300
 
 
श्लोक  2.9.300 
एइ तीर्थे शङ्करारण्येर सिद्धि - प्राप्ति हैल ।
प्रस्तावे श्री - रङ्ग - पुरी एतेक कहिल ॥300॥
 
 
अनुवाद
श्री रंग पुरी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को सूचित किया कि शंकरण्य नाम के संन्यासी ने उस पवित्र स्थान, पंडरपुर में पूर्णता प्राप्त की थी।
 
Sri Ranga Puri told Sri Chaitanya Mahaprabhu that in this very pilgrimage place, Pandarpur, a monk named Shankararanya had attained Siddhi.
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु के बड़े भाई का नाम विश्वरूप था। वह श्री चैतन्य महाप्रभु से पहले घर छोड़कर शंकारारण्य स्वामी के नाम से संन्यास धर्म में चले गए। उन्होंने पूरे देश की यात्रा की और अंततः पाण्डरपुर चले गये जहाँ उन्होंने पूर्णता पाने के बाद देह त्याग दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने पाण्डरपुर में अपना नश्वर शरीर त्यागने के बाद आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश किया। श्री माधवेंद्र पुरी के शिष्य और ईश्वर पुरी के गॉडब्रदर श्री रंग पुरी ने यह महत्वपूर्ण खबर श्री चैतन्य महाप्रभु को बताई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)