यह मायावादी सम्प्रदाय है जो प्रभु के पारलौकिक रूप को स्वीकार नहीं करता है। यदि कोई वैष्णव सम्प्रदाय भी उस अवैयक्तिक रवैये से बहक जाता है, तो उस सम्प्रदाय का कोई स्थान ही नहीं है। यह एक तथ्य है कि ऐसे कई तथाकथित वैष्णव हैं जिनका अंतिम उद्देश्य प्रभु के अस्तित्व में विलीन होना है। उदाहरण के लिए, सहजियों का वैष्णव दर्शन परम के साथ एक हो जाना है। श्री चैतन्य महाप्रभु बताते हैं कि श्री माधवेंद्र पुरी ने माधवाचार्य को केवल इसलिए स्वीकार किया क्योंकि उनके सम्प्रदाय ने प्रभु के पारलौकिक रूप को स्वीकार किया।
