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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 277
 
 
श्लोक  2.9.277 
सबे, एक गुण देखि तोमार सम्प्रदाये ।
सत्य - विग्रह क रि’ ईश्वरे करह निश्चये ॥277॥
 
 
अनुवाद
“मैं आपके सम्प्रदाय में एकमात्र योग्यता यह देखता हूँ कि आप भगवान के स्वरूप को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।”
 
“The only quality I see in your sect is this: you consider the Deity of the Lord to be the true form.”
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु माधवाचार्य सम्प्रदाय के तत्त्ववादी आचार्य को यह इंगित करना चाहते थे कि तत्त्ववादियों का सामान्य व्यवहार शुद्ध भक्ति सेवा का पक्ष नहीं लेता, जो कि कामनापूर्ण कार्यों और अनुमानिक ज्ञान के दोषों से रहित होना चाहिए। जहाँ तक काम निष्ठ कार्यों का संबंध है, उसका दोष जीवन के उच्चतर मानक के लिए उन्नति की इच्छा है, और अनुमानित ज्ञान का दोष परम सत्य के अस्तित्व में विलीन होने की इच्छा है। माधवाचार्य पाठशाला के तत्त्ववाद सम्प्रदाय वर्णाश्रम-धर्म के सिद्धांत पर टिका है, जिसमें काम निष्ठ कार्य शामिल हैं। उनका परम लक्ष्य (मुक्ति) केवल भौतिक इच्छा का एक रूप है। एक शुद्ध भक्त को सभी प्रकार की भौतिक इच्छाओं से मुक्त होना चाहिए। वह केवल भगवान की सेवा में संलग्न होता है। फिर भी, चैतन्य महाप्रभु इस बात से प्रसन्न थे कि माधवाचार्य सम्प्रदाय या तत्त्ववाद सम्प्रदाय ने भगवान के पारलौकिक रूप को स्वीकार किया। यह वैष्णव सम्प्रदायों की महान योग्यता है।

यह मायावादी सम्प्रदाय है जो प्रभु के पारलौकिक रूप को स्वीकार नहीं करता है। यदि कोई वैष्णव सम्प्रदाय भी उस अवैयक्तिक रवैये से बहक जाता है, तो उस सम्प्रदाय का कोई स्थान ही नहीं है। यह एक तथ्य है कि ऐसे कई तथाकथित वैष्णव हैं जिनका अंतिम उद्देश्य प्रभु के अस्तित्व में विलीन होना है। उदाहरण के लिए, सहजियों का वैष्णव दर्शन परम के साथ एक हो जाना है। श्री चैतन्य महाप्रभु बताते हैं कि श्री माधवेंद्र पुरी ने माधवाचार्य को केवल इसलिए स्वीकार किया क्योंकि उनके सम्प्रदाय ने प्रभु के पारलौकिक रूप को स्वीकार किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)