श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 266
 
 
श्लोक  2.9.266 
तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता ।
मत्कथा - श्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥266॥
 
 
अनुवाद
'जब तक मनुष्य सकाम कर्म से तृप्त नहीं होता और श्रवणं कीर्तनं विष्णुः द्वारा भक्ति के प्रति उसकी रुचि जागृत नहीं होती, तब तक उसे वैदिक आदेशों के नियामक सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना होता है।'
 
“Until a man is satisfied with fruitive action and develops a taste for devotion by Shravanam Kirtanam Vishnuh, he must perform his actions according to the rules and regulations of the Vedic injunctions.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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