श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 262
 
 
श्लोक  2.9.262 
एवं - व्रतः स्व - प्रिय - नाम - कीर्यो जातानुरागो द्रुत - चित्त उच्चैः ।
हसत्यथो रोदिति रौति गायत्य् उन्माद - वन्नृत्यति लोक - बाह्यः ॥262॥
 
 
अनुवाद
"जब कोई व्यक्ति वास्तव में उन्नत होता है और अपने प्रिय भगवान के पवित्र नाम के जाप में आनंद लेता है, तो वह उत्तेजित होकर ज़ोर-ज़ोर से पवित्र नाम का जाप करता है। वह हँसता भी है, रोता भी है, उत्तेजित भी होता है और पागलों की तरह नाम का जाप करता है, बाहरी लोगों की परवाह नहीं करता।"
 
"When a person is truly elevated and experiences joy in chanting the holy name of his beloved Lord, he becomes excited and loudly chants the holy name. He laughs, cries, becomes agitated, and chants like a madman, without caring for anyone."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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