श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 257
 
 
श्लोक  2.9.257 
‘पञ्च - विध मुक्ति’ पाञा वैकुण्ठे गमन ।
‘साध्य - श्रेष्ठ’ हय, - एइ शास्त्र - निरूपण ॥257॥
 
 
अनुवाद
"जब कोई वर्णाश्रम-धर्म के कर्तव्यों को कृष्ण को समर्पित कर देता है, तो वह पाँच प्रकार की मुक्ति का पात्र हो जाता है। इस प्रकार उसे वैकुंठ में आध्यात्मिक लोक में स्थानांतरित कर दिया जाता है। यही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य और सभी शास्त्रों का निर्णय है।"
 
"When a man dedicates the duties of the varna-ashrama dharma to Krishna, he becomes eligible for the fivefold liberation and is sent to the Vaikuntha planet. This is the highest goal of life and the conclusion of all scriptures."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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