श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 245
 
 
श्लोक  2.9.245 
मध्वाचार्य - स्थाने आइला याँहा ‘तत्त्ववा दी’ ।
उडुपीते ‘कृष्ण’ देखि, ताहाँ हैल प्रेमोन्मादी ॥245॥
 
 
अनुवाद
चैतन्य महाप्रभु इसके बाद माधवाचार्य के स्थान उडुपी पहुँचे, जहाँ तत्ववादी दार्शनिक निवास करते थे। वहाँ उन्होंने भगवान कृष्ण के विग्रह के दर्शन किए और आनंद से उन्मत्त हो गए।
 
Thereafter Chaitanya Mahaprabhu reached Udupi, the place of Madhvacharya, where the philosopher known as Tattvavadi lived. He became emotional after seeing the deity of Lord Krishna there.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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