श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 238
 
 
श्लोक  2.9.238 
पुँथि पाञा प्रभुर हैल आनन्द अपार ।
कम्पाश्रु - स्वेद - स्तम्भ - पुलक विकार ॥238॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु उस शास्त्र का एक अध्याय पाकर बहुत प्रसन्न हुए, और उनके शरीर में आनंदमय परिवर्तन के लक्षण - कम्पन, आँसू, पसीना, समाधि और उल्लास - प्रकट हुए।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu was very happy after receiving a chapter of this scripture and the emotional disorders of trembling, tears, sweat, samadhi and happiness appeared in his body.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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