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श्लोक 2.9.215  |
महा - दुःख हइते मोरे करिला निस्तार ।
आजि मोर घरे भिक्षा कर अङ्गीकार ॥215॥ |
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| अनुवाद |
| "मेरे प्रिय महोदय, आपने मुझे एक बहुत ही दुःखद स्थिति से मुक्ति दिलाई है। मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप अपना दोपहर का भोजन मेरे घर पर ही करें। कृपया इस निमंत्रण को स्वीकार करें।" |
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| "My lord, you have rescued me from a very difficult situation. I request that you have dinner at my house. Please accept my invitation." |
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