श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 211-212
 
 
श्लोक  2.9.211-212 
सीतयाराधितो वह्निश्छाया - सीतामजीजनत् ।
तां जहार दश - ग्रीवः सीता वह्नि - पुरं गता ॥211॥
परीक्षा - समये वह्निं छाया - सीता विवेश सा ।
वह्निः सीतां समानीय तत्पुरस्तादनीनयत् ॥212॥
 
 
अनुवाद
"जब माता सीता ने अग्निदेव से प्रार्थना की, तो अग्निदेव ने सीता का एक मायावी रूप प्रकट किया और दस सिरों वाले रावण ने उस नकली सीता का अपहरण कर लिया। तब असली सीता अग्निदेव के धाम चली गईं। जब भगवान रामचंद्र ने सीता के शरीर की परीक्षा ली, तो वही नकली, मायावी सीता अग्नि में प्रविष्ट हो गईं। उस समय अग्निदेव असली सीता को अपने धाम से लाकर भगवान रामचंद्र को सौंप गए।"
 
"When Sita invoked Agnidev, he brought forth a illusory form of Sita, and the ten-headed Ravana abducted this illusory form of Sita. The original Sita then went to Agnidev's home. When Lord Ramachandra tested Sita's physical form, it was the illusory form of Sita who entered the fire. At that very moment, Agnidev brought the original form of Sita from his home and offered it to Lord Ramachandra."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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