श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 160
 
 
श्लोक  2.9.160 
कृपा करि’ कहिले मोरे कृष्णेर महिमा ।
याँर रूप - गुणैश्वर्येर केह ना पाय सीमा ॥160॥
 
 
अनुवाद
"आपने अपनी अहैतुकी कृपा से मुझे भगवान कृष्ण की महिमा का वर्णन किया है। भगवान के ऐश्वर्य, गुणों और रूपों की सीमा तक कोई भी नहीं पहुँच सकता।
 
"By your causeless grace, you have revealed to me the glories of Lord Krishna. The Lord's opulence, qualities, and form are incalculable."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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