श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  2.9.143 
एते चांश - कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् ।
इन्द्रारि - व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥143॥
 
 
अनुवाद
"भगवान के ये सभी अवतार या तो पुरुष-अवतारों के पूर्ण अंश हैं या उनके पूर्ण अंशों के अंश हैं। किन्तु कृष्ण स्वयं भगवान हैं। प्रत्येक युग में जब इंद्र के शत्रुओं द्वारा संसार त्रस्त होता है, तब वे अपने विभिन्न रूपों द्वारा जगत की रक्षा करते हैं।"
 
"All these incarnations of God are parts or aspects of the Purusha avatara. But Krishna is the Supreme Personality of Godhead. Whenever the world is troubled by the enemies of Indra, in every age, He protects the world through His various forms."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd