श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.9.137 
अन्य देहे ना पाइये रास - विलास ।
अतएव ‘नायं’ श्लोक कहे वेद - व्यास ॥137॥
 
 
अनुवाद
“वैदिक साहित्य के सर्वोच्च विद्वान व्यासदेव ने ‘नायां सुखपो भगवान्’ से प्रारम्भ होने वाले श्लोक की रचना की, क्योंकि गोपी के अतिरिक्त किसी अन्य शरीर में कोई भी रास-लीला नृत्य में प्रवेश नहीं कर सकता।”
 
“Vyasadeva, the supreme authority on Vedic literature, composed the verse beginning with Nayam Sukhapo Bhagavan, because a person cannot enter into the Raas Leela dance in any other body except the bodies of the Gopis.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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