श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  2.9.121 
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्त - रतेः प्रसादः स्वर्योषितां नलिन - गन्ध - रुचां कुतोऽन्याः ।
रासोत्सवेऽस्य भुज - दण्ड - गृहीत - कण्ठ - लब्धाशिषां य उदगा व्रज - सुन्दरीणाम् ॥121॥
 
 
अनुवाद
“जब भगवान श्रीकृष्ण रासलीला में गोपियों के साथ नृत्य कर रहे थे, तब भगवान ने गोपियों को अपने गले में बाँहों में भर लिया था। यह दिव्य कृपा लक्ष्मी या आध्यात्मिक जगत की अन्य पत्नियों को कभी प्राप्त नहीं हुई। न ही स्वर्ग की परम सुंदरी कन्याओं ने कभी ऐसी कल्पना की थी, जिनकी शारीरिक आभा और सुगंध कमल पुष्पों के सौंदर्य और सुगंध के समान थी। और सांसारिक स्त्रियों की तो बात ही क्या, जो भौतिक दृष्टि से अत्यंत सुंदर हो सकती हैं?’
 
"When Lord Krishna danced with the gopis in the Raas Leela, he embraced them, holding them in his arms. This divine grace was unattainable for Lakshmi or the other beloveds of Vaikuntha. Nor did the most beautiful women of heaven, whose bodies radiate and smell like lotus flowers, ever imagine it. So what can be said about worldly women, no matter how beautiful they may be in physical terms?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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