श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  2.9.115 
भट्ट कहे, कृष्ण - नारायण - एकइ स्वरूप ।
कृष्णेते अधिक लीला - वैदग्ध्यादि - रूप ॥115॥
 
 
अनुवाद
तब वेंकट भट्ट ने कहा, "भगवान कृष्ण और भगवान नारायण एक ही हैं, लेकिन कृष्ण की लीलाएँ उनके क्रीड़ापूर्ण स्वभाव के कारण अधिक आनन्ददायक हैं।
 
Then Venkata Bhatta said, “Lord Krishna and Lord Narayana are one and the same form, but Krishna's pastimes are more delicious because of their playful essence.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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