श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 9: श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्राएँ  »  श्लोक 101
 
 
श्लोक  2.9.101 
यावत्पड़ों, तावत्पाङ ताँर दरशन ।
एइ ला गि’ गीता - पाठ ना छाड़े मोर मन ॥101॥
 
 
अनुवाद
"जब तक मैं भगवद्गीता पढ़ता हूँ, मुझे भगवान के सुंदर स्वरूपों का ही दर्शन होता है। इसीलिए मैं भगवद्गीता पढ़ रहा हूँ, और मेरा मन इससे विचलित नहीं हो सकता।"
 
"As long as I read the Gita, I see only the beautiful form of God. That is why I read the Bhagavad Gita, and my mind is not distracted by it."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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