श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.8.86 
गुणाधिक्ये स्वादाधिक्य बाड़े प्रति - रसे ।
शान्त - दास्य - सख्य - वात्सल्येर गुण मधुरेते वैसे ॥86॥
 
 
अनुवाद
"जैसे-जैसे गुण बढ़ते हैं, वैसे-वैसे प्रत्येक राग में स्वाद भी बढ़ता जाता है। इसलिए शांत-रस, दास्य-रस, सख्य-रस और वात्सल्य-रस में पाए जाने वाले सभी गुण दाम्पत्य प्रेम [माधुर्य-रस] में प्रकट होते हैं।"
 
"As the qualities increase, the taste of each rasa also increases. Therefore, all the qualities of Shanta rasa, Dasya rasa, Sakhya rasa, and Vatsalya rasa are manifested in Madhurya rasa."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)