सामान्यतः, देवता के प्रति प्रेम स्वामित्व की अंतरंगता से रहित होता है। सेवा के प्रेम के मामले में, विश्वास की कमी होती है। भाईचारे के संबंध में बढ़े हुए स्नेह की कमी होती है और इस स्नेह के माता-पिता के रिश्ते में बढ़ने पर भी, पूर्ण स्वतंत्रता की कमी होती है। हालाँकि, जब कोई कृष्ण का वैवाहिक प्रेमी बन जाता है, तो अन्य रिश्तों में जो कुछ भी कमी होती है वह पूरी तरह से प्रकट हो जाता है। वैवाहिक अवस्था में ईश्वर के प्रति प्रेम की किसी चीज़ की कमी नहीं होती। इस श्लोक का सार यह है कि ईश्वर के प्रति माता-पिता के प्रेम निश्चित रूप से भाईचारे के प्रेम से उच्चतर है और वैवाहिक प्रेम इससे भी ऊँचा है। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानंद राय से आगे बढ़ने का आग्रह किया, तब वे वैवाहिक संबंध के बिंदु पर पहुँचे, जो कि अलौकिक प्रेम की सर्वोच्च पूर्णता है।
