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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 79
 
 
श्लोक  2.8.79 
प्रभु कहे, “एहो उत्तम, आगे कह आ र” ।
राय कहे, “कान्ता - प्रेम सर्व - साध्य - सार” ॥79॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने कहा, "आपके कथन निश्चित रूप से एक के बाद एक बेहतर होते जा रहे हैं, लेकिन उन सभी को पार करते हुए एक और पारलौकिक मधुरता है, और आप इसे सबसे उदात्त कह सकते हैं।"
 
Mahaprabhu said, “Your utterances are becoming increasingly good, but there is another transcendental essence that you can best describe.” Ramanand Rai then replied, “In love of God, sweet attachment to Krishna is supreme.”
तात्पर्य
रामानंद राय ने तब उत्तर दिया, "कृष्ण के लिए वैवाहिक लगाव ही प्रेम में सर्वोच्च स्थान है।

सामान्यतः, देवता के प्रति प्रेम स्वामित्व की अंतरंगता से रहित होता है। सेवा के प्रेम के मामले में, विश्वास की कमी होती है। भाईचारे के संबंध में बढ़े हुए स्नेह की कमी होती है और इस स्नेह के माता-पिता के रिश्ते में बढ़ने पर भी, पूर्ण स्वतंत्रता की कमी होती है। हालाँकि, जब कोई कृष्ण का वैवाहिक प्रेमी बन जाता है, तो अन्य रिश्तों में जो कुछ भी कमी होती है वह पूरी तरह से प्रकट हो जाता है। वैवाहिक अवस्था में ईश्वर के प्रति प्रेम की किसी चीज़ की कमी नहीं होती। इस श्लोक का सार यह है कि ईश्वर के प्रति माता-पिता के प्रेम निश्चित रूप से भाईचारे के प्रेम से उच्चतर है और वैवाहिक प्रेम इससे भी ऊँचा है। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानंद राय से आगे बढ़ने का आग्रह किया, तब वे वैवाहिक संबंध के बिंदु पर पहुँचे, जो कि अलौकिक प्रेम की सर्वोच्च पूर्णता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)