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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  2.8.72 
यन्नाम - श्रुति - मात्रेण पुमान्भवति निर्मलः ।
तस्य तीर्थ - पदः किं वा दासानामवशिष्यते ॥72॥
 
 
अनुवाद
" 'जिन भगवान के चरणकमलों से तीर्थस्थानों का निर्माण होता है, उनके पवित्र नाम के श्रवण मात्र से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है। अतः जो उनके सेवक बन गए हैं, उनके लिए प्राप्त करने को क्या शेष रह जाता है?'
 
"One becomes pure simply by hearing the holy name of the Supreme Personality of Godhead, whose lotus feet create sacred places. Therefore, what remains for those who have become His servants to attain?"
तात्पर्य
यह श्रीमद्-भागवतम् (9.5.16) के उद्धरण है और महाऋषि दुर्वासा मुनि के द्वारा स्वीकृति की अभिव्यक्ति है। दुर्वासा मुनि, एक जाति-ब्राह्मण और महान योगी, महाराजा अम्बरिश को घृणा करते थे। जब उन्होंने अपनी योग शक्ति के माध्यम से महाराजा अम्बरिश को यातना देने का मन बनाया, तब परमेश्वर श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र द्वारा उन्हें पीछा किया गया। जब मामले को सुलझा लिया गया, उन्होंने कहा, "जब किसी भी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर का पवित्र नाम सुना जाता है, तो वह व्यक्ति तुरंत पवित्र हो जाता है। परमेश्वर भगवान भक्तों के स्वामी हैं, और भक्त, उनकी शरण में स्वाभाविक रूप से उनकी संपदा के स्वामी बन जाते हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)