ना धर्मं नादर्मं श्रुति-गण-निरुक्तं किला कुरु
व्रजे राधा-कृष्ण-प्रचुर-परिचर्यां इह तनु
इस प्रकार उनका आदेश दिया है कि हमें वेदों में विहित धार्मिक या अधार्मिक गतिविधियों का पालन नहीं करना चाहिए। सबसे श्रेष्ठ मार्ग यह है कि निरंतर भगवान कृष्ण और राधारानी की सेवा में लगे रहें। इस जीवन में यही सब कुछ का उत्कर्ष है। इसी प्रकार, श्रीमद्-भागवतम (4.29.46) में नारद मुनि ने कहा है:
यदा यस्यानुगृह्णाति भगवान आत्म-भावितः
स जहाति मतिं लोके वेदे च परिणिष्ठिताम्
"जब कोई वास्तव में भगवान के प्रति प्रेममय सेवा में लग जाता है, तो वह भौतिक जगत के सभी कर्तव्यों के साथ-साथ वैदिक साहित्य द्वारा निर्धारित सभी कर्तव्यों को त्याग देता है। इस प्रकार व्यक्ति भगवान की सेवा में स्थिर हो जाता है।"
