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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.8.44 
प्रभु कहे, - तुमि महा - भागवतोत्तम ।
तोमार दर्शने सबार द्रव हैल मन ॥44॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने रामानन्द राय को उत्तर दिया, “महाराज, आप श्रेष्ठतम भक्तों में श्रेष्ठ हैं; इसलिए आपके दर्शन मात्र से ही सभी के हृदय द्रवित हो गए हैं।
 
Mahaprabhu replied to Ramanand Rai, “O Sir, you are the crown jewel of the supreme devotees, therefore everyone's heart is moved by your sight.”
तात्पर्य
किसी के पास जब तक प्रथम श्रेणी की भक्ति न हो, तब तक वह उपदेशक नहीं हो सकता। एक उपदेशक आम तौर पर सबसे बड़ा भक्त होता है, लेकिन आम जनता से मिलने के लिए, उसे भक्तों और गैर-भक्तों के बीच अंतर करना पड़ता है। अन्यथा, एक उन्नत भक्त ऐसे कोई भेद नहीं करता है। दरअसल, वह हमेशा देखता है कि हर कोई भगवान की सेवा में लगा हुआ है। जब कोई प्रचार कार्य करता है, तो उसे लोगों के बीच भेद करना चाहिए और समझना चाहिए कि कुछ लोग भगवान की भक्ति सेवा में व्यस्त नहीं हैं। तब प्रचारक को ऐसे भोले लोगों पर दया करनी चाहिए जो नहीं जानते कि भगवान की पूजा कैसे करें। श्रीमद-भागवतम (11.2.45) में, एक शीर्ष भक्त के लक्षणों का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

सर्व-भूतेषु यः पश्येद् भगवद्-भावम् आत्मनः

भूतानि भगवत्य आत्मन्य एष भगवत उत्तमः

"उन्नत भक्त देखता है कि सभी जीवित संस्थाएं ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के अंग हैं। हर कोई कृष्ण में है, और कृष्ण भी हर किसी के भीतर है। ऐसा दर्शन केवल उसी व्यक्ति के लिए संभव है जो भक्ति सेवा में बहुत उन्नत है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)