श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 306
 
 
श्लोक  2.8.306 
ये इहा एक - बार पिये कर्ण - द्वारे ।
तार कर्ण लोभे इहा छाड़िते ना पारे ॥306॥
 
 
अनुवाद
इस अद्भुत व्यंजन को श्रवण द्वारा ग्रहण करना आवश्यक है। यदि कोई इसे ग्रहण करता है, तो वह इसका और भी अधिक आनंद लेने के लिए लालायित हो उठता है।
 
This wonderful dish is to be tasted with the ears. Anyone who tastes it yearns for more.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)