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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 285
 
 
श्लोक  2.8.285 
आलिङ्गन करि’ प्रभु कैल आश्वासन ।
तोमा विना एइ - रूप ना देखे अन्य - जन ॥285॥
 
 
अनुवाद
रामानन्द राय को गले लगाने के बाद भगवान ने उन्हें शांत करते हुए कहा, "लेकिन आपके लिए, किसी ने भी यह रूप नहीं देखा है।"
 
After embracing Ramanand Rai, Mahaprabhu consoled him and said, “No one else except you has seen this form.”
तात्पर्य
भगवद्-गीता (7.25) में भगवान कृष्ण कहते हैं:

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योग-माया-समावृताः

मूढोऽयं नाभिजानाति लोक मामजम अव्ययम

"मैं मूर्ख और अविवेकी लोगों के सामने कभी प्रकट नहीं होता। उनके लिए मैं अपनी आंतरिक शक्ति [योगमाया] से ढका हुआ हूं, इसलिए वे मुझे नहीं जानते, जो अजन्मे और अचूक हूं।"

भगवान हमेशा सभी के सामने प्रकट न होने के अधिकार का उपयोग करते हैं। हालाँकि, भक्त हमेशा भगवान की सेवा में लगे रहते हैं, हरे कृष्ण मंत्र का जाप करके और महाप्रसाद का स्वाद लेकर अपनी जीभ से सेवा करते हैं। धीरे-धीरे निष्ठावान भक्त भगवान को प्रसन्न करते हैं और भगवान स्वयं को प्रकट करते हैं। कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत प्रयासों से भगवान को नहीं देख सकता है। बल्कि, जब भगवान भक्त की सेवा से प्रसन्न होते हैं, तो वे स्वयं को प्रकट करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)