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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 265
 
 
श्लोक  2.8.265 
अन्तर्यामी ईश्वरेर एइ रीति हये ।
बाहिरे ना कहे, वस्तु प्रकाशे हृदये ॥265॥
 
 
अनुवाद
रामानंद राय ने आगे कहा, "प्रत्येक के हृदय में स्थित परमात्मा बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से बोलता है। वह भक्तों को सभी प्रकार से शिक्षा देता है, और यही उसकी शिक्षा का तरीका है।"
 
Ramanand Rai further said, "God speaks from within each person's heart, not from outside. He teaches his devotees in all ways, and this is his method of preaching."
तात्पर्य
यहाँ श्री रामानंद राय स्वीकार करते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु परमात्मा हैं| परमात्मा ही भक्त को प्रेरित करता है| इसलिए वे गायत्री मंत्र का मूलस्रोत हैं, जिसमें कहा गया है, ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्| सवितृ सभी बुद्धि का मूलस्रोत है| वह सवितृ भगवान चैतन्य महाप्रभु हैं| श्रीमद् भागवतम् (२.४.२२) में इसकी पुष्टि की गई है:

प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती

 वितन्वताजस्य सतीम् स्मृतिम् हृदि

स्व-लक्षणा प्रादुर्भूत किलास्यताः

 स मे ऋषीणां ऋषभः प्रसीदताम्

"प्रभु, जिन्होंने सृष्टि की शुरुआत में ब्रह्मा के हृदय से प्रभावशाली ज्ञान को विस्तारित किया और उन्हें सृष्टि और उनके अपने पूर्ण ज्ञान से प्रेरित किया, और जो ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए प्रतीत हुए, वे मुझ पर प्रसन्न हों।" यह श्रीमद् भागवतम को महाराज परीक्षित को सुनाने से पहले शुकदेव गोस्वामी द्वारा कहा गया था जब उन्होंने भगवान की कृपा का आह्वान किया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)