ब्रह्मजी का हृदय भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से प्रकाशित था। स्वेताश्वतर उपनिषद (6.18) में वेदों में दी गई जानकारी इस प्रकार है:
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदान्श्च प्रहिणोति तस्मै
तं ह देवं आत्म-बुद्धि-प्रकाशं
मुमुक्षुर वै शरणमहम प्रपद्ये
“मैं परमपद की प्राप्ति की अभिलाषा करता हूँ, इसलिये मैं उस परमपद के भगवान के चरणों में शरणागत होता हूँ, जिन्होंने ब्रह्मजी के हृदय के माध्यम से वेदों का ज्ञान प्रकट कर ब्रह्मजी को सर्वप्रथम ज्ञान का प्रकाश दिया। वे भगवान ही ज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति की मूल सत्ता हैं।” इस संदर्भ में श्रीमद्भागवतम 2.9.30-35, 11.14.3, 12.4.40 और 12.13.19 को भी पढ़ा जा सकता है।
