अरस - ज्ञ काक चूषे ज्ञान - निम्ब - फले ।
रस - ज्ञ कोकिल खाय प्रेमाम्र - मुकुले ॥258॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
रामानन्द राय ने आगे कहा, "जो लोग समस्त दिव्य सुखों से रहित हैं, वे कौओं के समान हैं जो ज्ञान के निम्ब वृक्ष के कड़वे फलों से रस चूसते हैं, जबकि जो लोग सुखों का आनंद लेते हैं, वे कोयल के समान हैं जो भगवत्प्रेम के आम के वृक्ष की कलियाँ खाती हैं।"
Ramanand Rai further said, “People devoid of all divine essences (arasikas) are like the crows who suck the bitter fruits of the neem tree of knowledge, while those who are knowledgeable about essences are like the cuckoos who eat the buds of the mango tree of love of God.”
तात्पर्य
अनुभववादी दर्शन की विचारात्मक प्रक्रिया नीम के फल की तरह कड़वी होती है। इस फल का स्वाद लेना कौओं का काम होता है। दूसरे शब्दों में, परम सत्य को साकार करने की दार्शनिक प्रक्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है जो कौवे जैसे लोग अपनाते हैं। लेकिन कोयल जैसे भक्तों की आवाजें बहुत मधुर होती हैं, जिससे वे भगवान के पवित्र नाम का जाप करते हैं और ईश्वर के प्रेम के आम के पेड़ के मीठे फल का स्वाद लेते हैं। ऐसे भक्त भगवान के साथ मीठे मेल का आनंद लेते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥