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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 8: श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री रामानन्द राय के बीच वार्तालाप  »  श्लोक 250
 
 
श्लोक  2.8.250 
‘गान - मध्ये कोन गान - जीवेर निज धर्म ?’ ।
‘राधा - कृष्णेर प्रेम - केलि’ - येइ गीतेर मर्म ॥250॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय से पूछा, "अनेक गीतों में से कौन सा गीत जीव का वास्तविक धर्म माना जाना चाहिए?"
 
Then Sri Chaitanya Mahaprabhu asked Ramanand Rai, “Which of the many songs should be considered the true religion of the living entity?” Ramanand Rai replied, “The song describing the love of Sri Radha and Krishna is superior to all other songs.”
तात्पर्य
रामानन्द राय ने उत्तर दिया, "श्री राधा और कृष्ण के प्रेम संबंधों का वर्णन करने वाला वह गीत सभी अन्य गीतों से श्रेष्ठ है।"

जैसा कि श्रीमद-भागवतम (१०.३३.३६) में कहा गया है:

अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमास्थितः

भजते तादृशीः क्रीडा या: श्रुत्वा तत्परो भवेत

"भगवान कृष्ण मानव के रूप में अवतरित होते हैं, और वे वृंदावन में अपने दिव्य लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं ताकि बंधी हुई आत्मा उनकी दिव्य गतिविधियों को सुनने के लिए आकर्षित हो सके।" गैर-भक्तों को राधा और कृष्ण के प्रेम संबंधों का जश्न मनाने वाले गीतों में भाग लेने से सख्त मना किया गया है। जब तक कोई एक भक्त नहीं है, तब तक राधा और कृष्ण के लीलाओं के बारे में गीत सुनना बहुत खतरनाक है जो जयदेव गोस्वामी, चंडीदास और अन्य महान भक्तों द्वारा लिखे गए थे। भगवान शिव ने जहर का सागर पिया, लेकिन इसकी नकल नहीं करनी चाहिए। पहले भगवान कृष्ण के शुद्ध भक्त बनना चाहिए। तभी जयदेव के गीत सुनने और दिव्य आनंद लेने का आनंद ले सकते हैं। यदि कोई केवल भगवान शिव की हरकतों की नकल करता है और जहर पीता है, तो वह निश्चित रूप से मौत से मिलेगा।

भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु और रामानंद राय के बीच की बातचीत केवल उन्नत भक्तों के लिए है। जो लोग सांसारिक मंच पर हैं और पीएचडी के लिए कुछ थीसिस उपस्थित करने के लिए इन वार्ता का अध्ययन करते हैं, वे उन्हें समझ नहीं पाएंगे। इसके बजाय, इन बातचीत का ज़हरीला प्रभाव पड़ेगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)